थारु अँट्वारी ओ महाभारत प्रसङ्ग

लक्की चौधरी
२८ भाद्र २०७८, सोमबार
थारु अँट्वारी ओ महाभारत प्रसङ्ग

थारु अँट्वारी ओ महाभारत प्रसङ्ग

थारु समुदायके मौलिक टिहुवार हो ‘अँट्वारी’ । पारिवारिक सम्बन्ध बनइना यी टिहुवार मुख्य विशेषता हो । पश्चिम नेपालके थारु समुदाय विशेष कैके यी टिहुवार मनैठैं । थारु पुरुष व्रत बैठना टिहुवारके रुपमे फेन यी चिन्हजाइठ । थारु महिला अस्टिम्कीमे व्रत बैठ्ठैं । पुरुष अँट्वारीमे । स्वइच्छासे पुरुष अस्टिम्कीमे ओ महिला अँट्वारीमे फेन ब्रत बैठ्ठैं । पश्चिम नेपालके थारुनके वर्षदिनमे व्रत बैठ्ना टिहुवार यिहे दुईठो हो । वर्षभर टमान टिहुवार अइलेसे फेन औरे टिहुवारमे थारु समुदायके मनैं व्रत नैबैठ्ठैं । थारु महिला अस्टिम्कीमे कृष्ण भगवानके व्रत बैठ्ठैं । मने थारु पुरुष अँट्वारीमे सूर्य देवता ओ पाँच पाण्डवमध्येके कुन्तीके महिला छावा भेवाँ (भीम) के व्रत बैठ्ठैं ।

थारु समुदायके देवथानमे आउर देवता जस्टे पाण्डवके उच्च स्थान बा । महाभारतकालिन प्रसङ्ग एम्ने जोरजाइठ । महाभारत युद्धके प्रमुख निर्देशक भगवान कृष्ण रहिंट । पात्र टमान रलेसेफेन कृष्णके निर्देशनमे महाभारत युद्ध हुइल रहे । धर्म ओ अधर्मके लराइमे ‘धर्म ओ सत्य’के जीत हुइ परठ कना मूल उद्देश्यसाथ भगवान कृष्ण मानव अवतारमे पृथ्वीमे अबतरित् हुइलैं । पाण्डव ओ कौरवबीच घमासान युद्ध हुइल । पाण्डव ओइने धर्म ओ सत्यके पक्षमे रहिंट । कौरव ओइने अधर्म ओ असत्यके । कौरवके नेतृत्व हस्तिनापुरके राजा धृतराष्ट्र कैले रहिंट । धृतराष्ट्र गान्धारीके दुर्योधनसहित सय जाने छावा रहिंट । पाण्डव पक्षके नेतृत्व युधिष्ठिर कैले रहिंट । मने कृष्णके निर्देशनमे सब काम होए । कुन्तीके छ जाने छावा कर्ण, युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नहकुल ओ सहदेव रहिंट । मने बर्का छावा कर्ण कौरवके पक्षमे युद्ध लरलैं । सुर्य के पुत्र कर्णहे कुन्ती जन्मटि किल लडियामे बगा डेले रहिन । दुर्बासा ऋषि सिखाइल मन्टर परीक्षणके लाग जप कैके सूर्यदेव प्रकट हुइलैं । सूर्यदेव कुन्तिहे पुत्रकेरुपमे ‘कर्ण’ उपहार डेलैं । मने कुन्ति ओहेबेला अविवाहित हुइलेक ओरसे समाजके डरलेके कर्णहे लडियामे बगा डेलिन । लडियामे बच्चा रोइटी रहल फेला पारल ओरसे एक शुद दम्पती कर्णहे हुरकैलैं । कर्ण भगवान पर्शुरामसंग धनुणविद्या सिख्लैं । ब्राह्मण कहिके धनुणविद्या सिखल कर्ण पाछे सुदपुत्र हुइल पर्शुराम पटा पैलैं टे उहिहे श्राप डेलैं । अन्तिम लराइमे धनुणविद्या काम नैकर्ना हुँकार श्राप रहे । हुइना टे नहकुल ओ सहदेव कुन्तीक छावा नैरहिंट । पाण्डुके छुट्की जन्नी माद्रीसे दुई सन्तान जन्मल रहिंट । मने पाँच भाइके मैयाँ प्रेम बहुट गार्ह रहिन । पाँचु जे कुन्तिक् छावक् नाउँसे परिचित रहिंट । भगवान कृष्णके लीलासंग महाभारत जोरल ओरसे महाभारतके प्रमुख पात्र पाण्डव ओइने देवताके रुपमे पुज्जाइँट् । ओसिक टे छ जाने भाइ कौनो न कौनो देवताके छावा रहिंट । कुन्ति ओ माद्री उपहारके रुपमे छावा भेटैले रहिंट ।

पाण्डव जन्म
हस्तिनापुरके राजा पाण्डु डुनु जन्नी (कुन्ती ओ माद्री) लेके शिकार खेले जंगल गैल रहिंट । उ राजा मृगके जोरीनहे मैथुनरत डेख्लैं । बाणसे उ डुनु मृगहे घायल कैडेलैं । मुएबेर मृग पाण्डुहे श्राप डेलैं, ‘राजन ! टुँ बहुट क्रुर पुरुष बटो । महिन मैथुनके समय बाण मारके भारी गल्ती करलो । जब टुँ किहुसे मैथुनरत हुइबो ओहेबेला टोहाँर मौट हुइ ।’ श्राप सुनके राजा पाण्डु दुःखी हुइलैं । हुँकार दुई रानी रहिन । मने सन्तान नैरहिन । उ डुनु रानीन ठें कलैं, ‘हे देवी ! आब मै अपन सब वास त्यागके बनुवाँमे अक्केली बैठम, टोहरे हस्तिनापुर लौटके जाउ ।’ हुँकार बात सुनके डुनु रानी दुःखी हुइलैं ओ कलैं, ‘हे नाथ ! हमरे अपने विना एकक्षण जिए नैसकब । अपन संग हम्रिहिन फेन बनुवाँमे बैठ्ना कृपा कैडेउ ।’ राजा पाण्डुल डुनु रानीनहे अपन संग बनुवामे बैठ्ना अनुमति डेलैं ।

राजा पाण्डु गल्तीसे दुःखी रहिंट । चिन्तामे डुबल रहिंट । ओहे समय पाण्डु अमावसके दिन ऋषीमुनीनहे ब्रह्माके दर्शनके लाग जाइट् डेख्लैं । अपनहे फेन संगे लैजाइक लाग पाण्डु ऋषीसंग अर्जि करलैं । एक ऋषि कलैं, ‘राजन ! निःसन्तान पुरुषहे ब्रह्मलोक जैना अधिकार नैहो । अतः हमरे टुहिनहे लैजाइ असमर्थ बटि ।’ ऋषिके बात सुनके पाण्डु कुन्तीसंग कलैं, ‘हे कुन्ती ! मै जन्म लेना व्यर्थ बा । सन्तानहिन व्यक्ति पितृ ऋण, ऋषि ऋण, देव ऋण, मनुष्य ऋणसे मुक्ती पाइ नैसेकम । का टुँ पुत्र प्राप्तीमे महिन सहयोग करे सेक्बो ?’ राजाके बात सुनके कुन्ती कलिन्, ‘हे आर्यपुत्र ! दुर्वासा ऋषि महि अइसिन मन्टर सिखैले बटैं, कि मै कौनो फेन देवताहे बलाके मनोवान्छित (मनमे चिटाइल) वस्तु प्राप्त करे सेकम । अपने आज्ञा करि, मै कौन देवताहे बलाउँ ।’

कुन्तीके बात सुनके पाण्डु देवता धर्मराजहे बलाइ कलैं । दुर्वासा ऋषिके मन्टर पर्हलैं टे धर्मराज देवता प्रकट हुइलैं । धर्मराज कुन्तीहे छोरा उपहार डेलिन । हुँकार नाउँ युधिष्ठिर ढरलैं । फेन डोसर पुत्रके लाग कुन्ती वायुदेवहे बलैलैं । वायुदेव प्रकट होके पुत्र उपहार डेलैं । हुँकार नाउँ भीम ढरलैं । ओस्टके फेनसे बलाके इन्द्र देवता प्रकट हुइलैं । हुकाँर डेहल पुत्रके नाउँ अर्जुन ढरलैं । ओहे मन्टर कुन्ती अपन सौटिनियाँ बहिनियाँ माद्रीहे सिखैलिन । माद्री फेन ओहे मन्टर जपलिन । माद्री अश्वनीकुमार देवताहे स्मरण करलिन् । देवता दुई पुत्र डेलिन । नाउँ नहकुल ओ सहदेव ढरलिन ।

बकासुर बध
बकासुर एक दानव रहे । पाण्डव ओइनके अज्ञात बासके बेला हुँकार बध भेवाँ (भीम) करले रहिंट । हालके भारतके ईलाहवाद जिल्लामे पर्ना चक्रनगरीमे किसान ओइने बैठिंट । पाँच पाण्डव ओइने १२ वर्ष वनवास सेकके एक वर्ष अज्ञात बास बैठ्लैं । अज्ञात बासके बेला हस्तिनापुरके कौनो फेन सदस्य डेख्लेसे या चिन्हलेसे पुनः १२ वर्ष वनवाँस ओ एक वर्षे अज्ञात बास थप बैठ्ना शर्त ढारल रहे । ओहेमारे पाण्डव ओइने अज्ञात बासके समय नुकके बैठिंट ।

अज्ञातबास हुइल बेला पाँच पाण्डव आमा कुन्तीसहित घुम्टीफिरटि चक्रनगरी गाउँमे पुगलैं । जहाँ बकासुर राक्षसके आटंक रहे । हरेक दिन पालिकपाला गाउँबासी डानव बकासुरहे गुफामे जाके भोजन (खाना) पुगाइठ् । भोजनसंगे गाउँके एक मनैनहे उ मारके खाए । गाउँके एक घरमे पाँच पाण्डव कुछ दिनके लाग शरण लेहल रहिंट । खाना पुगैना पाला ओहे घरके आगैल । घरम् गोस्या गोसिनिया एकठो छाइ ओ एकठो छावा रहिन् । घरके मनैबीच दानवहे खाना पुगइना बारेम् छलफल चलल् । कुन्ती सल्लाह डेलिन् । मोरठे पाँचठो छावा बटैं । किहु एक जहन राक्षस मारके खाडि कलेसे फेन चारजे बाँकी रहिहिं । मने टुहिनके टे एकठो छावा ओ एकठो छाइ किल बटैं । ओहेमारे खाना लेके राक्षसकेठन् मोर कौनो एकठो छावाहे जाइडेउ । हँुकार बातहे घरक् मनै नैमन्नै । पाहुनाहे काहे राक्षसके आहारा बनइना ? पाप काम हुइ कलेसे । मने कुन्तिके सल्लाहके बाड घरके मनै तयार हुइलंै । कुन्तिहे गाउँके समस्याके बारेम अपन छावाहे बटैलिन् । पाँच छावा वीच राक्षसके ठन खाना लेके के जइना, छलफल चलल् । कुन्ती भीमहे राक्षस बकासुरकेठन् खाना पुगाइ जइना कलिन् । भीम लहरुमे खाना ढारके जंगलमे रहल राक्षसके गुफामे पुग्लै । राक्षसके लाग लैगैल सक्कु खाना भीम अपनहि खालेलै । चाल पाइल टे राक्षस गुफासे बाहेर निक्रल । भीमहे खाना खाइट डेखके राक्षस चुर होगैल । भीमहे आक्रमण करल । भीम बलवान रहिंट । डुनुहुनके डट्के लराइ हुइलिन । अन्तिममे भीम राक्षस बकासुरके बध करनै । चक्रनगरके गाउँबासी खुशी हुइनै । राक्षसके आतंकसे सडाके लाग मुक्त हुइलैं । आब गाउँक् कौनो फेन मनै ज्यान गुमैनासे मुक्त हुइलै । खुशीसे गाउँमे भोजभटेर चलल् । भीम गाउँबासीके रक्षा करलैं ।

अँट्वारीके प्रसङ्ग
भेवाँ (भीम) सहित पाँच पाण्डव जहाँ शरण लेके बैठल रहिंट, ओहे चक्रनगर थारुगाउँ रहे । गाउँके सदस्यहे दानवके चङ्गुलसे जोगैलक कारण थारु ओइने भीमहे देवताके रुपमे स्वीकरलैं । पाँच पाण्डवहे देवथानमे स्थान डेहल किंवदन्ती बा । आझ थारु गाउँके सब देवथान (मर्वा) मे पाँच पाण्डवके स्थान सुरक्षित बा । जौन फेन पूजामे पुज्जैठैं । थारु मन्टरमे शिव, पार्वती, व्रह्मा, विष्णुसंगे पाँच पाण्डवके प्रसङ्ग बा । राक्षससे थारु चेली ओ गाउँबासीनहे रक्षा करलक सम्झनामे थारु पुरुष अँट्वारीमे भीमके व्रत बैठ्ठैं । पूजा करठैं । राक्षस बकासुरके बध के बाड गाउँबासी गाउँमे खुशीयाली ओ भोज भटेर कैके रमैलैं । व्रत के बाड थारु व्रतालु अपन विवाहित चेलीबेटीनहे उपहारके रुपमे मिठा परिकार डेठैं । अइसिक डेहल मिठमिठ परिकारहे ‘अग्रासन’ कहिजाइठ् । थारु समुदाय अँट्वारी टिहुवार अइसिक मनैठैं । अँट्वारी हरेक वर्ष कुश अमाँवसके पहिल अँटवार मनाजाइठ । अँट्वारी टिहुवार मनैना बारेमे थारु समुदायमे मेरमे।िक किंवदन्ती बा । मने भेवाँसंग जोरल कहानी यी किंवदन्ती ढेर तर्कपूर्ण बा ।


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