मन्के लागल ‘मनके आवाज’

सागर कुस्मी
३१ भाद्र २०७८, बिहीबार
मन्के लागल ‘मनके आवाज’

मन्के लागल ‘मनके आवाज’

विगत ढेर बरससे कंचनपुरके साहित्यिक स्रस्टा लोगनके खोजीमे डौरटि रहल यी पंक्तिकारके आब बलटल साँस अइलिस । कंचनपुर जिल्लाके थारु भासामे गजल लिख्के कृति प्रकासन करुइया अशोक चौधरी पहिल स्रस्टा हुइँट् । एम्ने कौनो दुइ मत नैहो । आझ खुसी लग्ना बात काहो कलेसे आब कंचनपुर जिल्लामेफें थारु गजल मन्के लागल बा ।

दांग डेउखरके साहित्यकार कृष्णराज सर्वहारीक् अन्सार थारु भासक् पहिल गजल संग्रह कैलालीक् जोखन रत्गैंयाँके चोराइल मन (२०५७) छपल बटिन कहिके उहाँ डाबी करठैं । मने इ कहुँ फेन फेला परल नैहो । यी पोस्टा छानबिन कैना जरुरी बा ।

मने इतिहास अध्ययन कैना हो कलेसे थारु भासाके गजल संग्रहके इतिहास अइसिन बा । दांगडेउखरके भुवन भाइके ‘आछट’ (२०६१ बैशाख), कैलालीक् लक्की चौधरीके ‘सहिदान’ (२०६१ जेठ), दांगडेउखरके छविलाल कोपिलाके ‘भौगर’ (२०६१ भादो), कैलालीक् छपिलाल चौधरीके छिट्रल अक्षर (२०६२), कैलालीक् लक्की चौधरीके ‘अन्तरभाव’ (२०६३), दांगडेउखरके छविलाल कोपिलाके ‘कैले फुल्छ ऊ ?’ बाल गजल संग्रह (२०६३), कैलालीक् लाहुराम चौधरी जहरके ‘फुलरिया’ (२०६६), कैलालीक् सागर कुश्मी संगतके ‘हस्ताक्षर’ (२०६८), कैलालीक् सागर कुश्मी संगतके ‘फुटल पाक्री’ (२०६८), कैलालीक् खुशीराम चौधरीके ‘विक्षिप्त मुटु’ (२०६८), कैलालीक् मोतीराम चौधरी रत्नके ‘मनके बोझा’ (२०७०), कैलालीक् रामचरण चौधरी अजराइलके ‘मोर टुटल झोंपरी’ (२०७०), कैलालीक् रविना चौधरीक् ओंरी गजल संग्रह (२०७१), कंचनपुरके अशोक चौधरीके ‘मनके आवाज’ (२०७०) आइल बा ।

अझकल औरे विधासेफें अझकलिक स्रस्टा ओइने ढेर जैसिन गजल विधामे कलम चलाइल पाजाइठ् । जस्टे कि जन्नीनहे सुग्घुर बिल्गाइक लाग सिंगार पटार चहठिन । ओस्टके गजलफें सोहावन बनाइक लाग सिंगारिक गजल हुइ परठ । यीहे क्रममे कंचनपुरीक् अशोक चौधरी मनके आवाज गजल संग्रह लेके आइल बटैं । उहाँ काकरे गजल लिखे भिरलैं टे ?
जिन्गीके सारा खुसी ढल लागल म्वाँर ।
अपन भाग्य काजे हो छल लागल म्वाँर ।
(गजल २२)

भित्री मनके नुकल बात लिख्ना प्रयास कर्ल बाटुँ ।
लाज डर भगाकन झिक्ना प्रयास कर्ल बाटुँ ।
(गजल ३५)

अइसिक उप्रक गजलके सेर हेर्लसे अशोक जी काहे गजल लिख्लैं कना प्रश्नक् जवाफ प्रमाणित करठ । मन उडास हुइल बेला बैराग किहि नैलागि । लागठ टे उहाँ शब्दक् सागरमे कुडके लहाइट बटैं अपन प्यारीहे समझके ।
हर दिन रह रात सम्झल बाटुँ मै ।
टोहाँर प्यारी मैयँम् अल्झल बाटुँ मै ।
(गजल ३०)

गजल कलक् काहो ? एकर परिभासा गजलकार ओइनके अपन अपन छुट्टे बटिन । मने अब्बे भर गजलकार जीके परिभासा उचित रहि ।
दिल दिमागके लठ्ठ बनैना जहर हो गजल ।
निरास जीवनहे बाँच सिखैना रहर हो गजल ।
(गजल १)

हुइना टे अझकल राजनीतिक् माहोल ढिकल बा । गाउँ बस्ती उजार हुइटि बा । सबजे अपन अपन पहिचान खोज्टि बटैं । अपन अपन अधिकार खोज्टि बटैं । ओहे लाइनमे गजलकार जी फेन ठरयाइल बटैं ।
हमार बैठल हमार जल्मल ठाउँ कहाँ गिल ।
सुन्दर ओ शान्त हराभराके गाउँ कहाँ गिल ।

अपन अस्तित्व बचाइकलाग पहिचानके खोजि बा,
जग्गा जमिन हमार बनाइल नाउँ कहाँ गिल ।
(गजल ३३)

लोकतन्त्र आइल कठ बोली ओस्टहें बा ।
बन्ढुकमसे अइना चट्कार गोली ओस्टहें बा ।

बाँच ओ खाइ पैना हमार अधिकार हो,
मनै मर्ना हत्यारनके टोली ओस्टहें बा ।
(गजल ३२)

यी एक्काइसौं शताब्दीमे कोइफें चिपाइल बैठ्के कौनो काम नैहो । अपन हिँस्सा अगोरक् लाग, अधिकार खोजक् लाग अशोक जी फें अप्नेहें सचेत हुइल बटैं ।
सुटल निडाइल मनैनहे जगाइ पर्ना बा ।
विकास कर्ना डगरम मन लगाइ पर्ना बा ।

पर्हाइ लिखाइ करके चेतनशिल बनक लाग,
अशिक्षा ओ अज्ञानताहे भगाइ पर्ना बा ।

गजलके भाव रस सिंगारिक हुइलक ओरसे हुइ यी गजल संग्रहमे मैयाँ प्रेमके संख्या ढेर बा । अझकलिक ठरियाँ, बठिनिनके लाग उपयुक्तफें बा ।

लाखौ लाख बँच्ना टुहिन आस डेहल बाटुँ ।
भग्वान कसम यी दिलम बास डेहल बाटुँ ।
(गजल २५)

पिरटिके फुलरियाम फुल्नास मन लागल,
टुहाँर हाँठ पकर कन डुल्नास मन लागल ।
(गजल २७)

अइसिके गजलकार अपन संग्रहमे समसामहिक परिवेश, समाजमे रहल विकृति, कुविचार, अज्ञानता, देशम हुइना बन्द, हर्टाल, लराइ आदि हटाइ पर्ना विचार ढर्ले बटैं । हुँकार यी कृतिमे मैयाँके बाट ओ प्रेममे निरासाके भावफें व्यक्त बटिन । फिरभि उहाँ बहुट मेहनत करले बटैं । मुल्यांकन करि हुँकाहार यी शेर ।
अत्याचारके विरुद्धम हम्र सक्कु थारु उठी संघारी ।
हमार समाज विकासके लाग चारुओरसे जुटी संघारी ।

एकताम बल रहठ कठ भारी काम करक लाग,
डाडु भैया सक्कु मिल्के एक्क माला गुँठी संघारी ।
(गजल १३)

हत्या हिसां आतंकहे हटैलसे टब शान्ति हुइ ।
चोर डाँकन पकर कन ठठैलसे टब शान्ति हुइ ।
(गजल ४)

गजल अपन छुट्टे नियम बटिस् । उ नियमसे बाहेर रहिके गजल लिख्लेसे सुग्घुर गजलफें बिगर जाइठ् या उ फजल बनजाइठ् । एम्ने ठनिक अशोक जिहे गहिरके गेंह लगैही परहिन । ढेर गजलके बारेम अध्ययन करे परहिन । गजलके ढकढिउरी अर्थात मुटु काफिया हुइलक ओरसे कौनो कौनो गजल शेर नियमसे बाहेर जाइ खोजल बा । रदिफके प्रयोग मजासे हुइलसेफें टखल्लुसके प्रयोग हुइल नैडेखजाइठ् ।

केराफटक्के हेर्लसे, कान ढैके सुन्लेसे ‘मनके आवाज’ चारुओर जोरसे सबके कानमे मन्के सेकठ् । एकर भिट्टर अट्रा ढेर आवाज अटाइल बा की यी छोटमोट भुमिकासे वर्णन कर्ना सम्भव नैहो । पाठक वर्ग हुँकनके हाँठमे यी किताब पुगी कलेसे जरुर कमि कमजोरी बटैही । अस्टे अस्टे विचार मनन कैके गजलकार जी अपन पहिल पैला आघे सारे सेकही कलेसे पक्काफें हुँकाहार भविष्य जोन्याहस् ओजरार हुइहिन ।

जैटिजैटि अपन निरन्तर मेहनतके साथ फेन यी गजल संग्रह ‘मनके आवाज’ सबके मनमे आवाज बने सेकल, ओ सक्कु गजल स्रस्टा हुँकनके मनम डुले सेकल । ओस्टहँके पाठक वर्ग हुँकनके मैगर गोचाली बने ओ मघाहा भुरि करैया मिठमिठ स्वाद चिखाय, कहटि डोसर कृतिफें हलिहलि हाँठमे परे । बहुट बहुट ढकिया भरभर बखारिक बखारिक शुभकामना डेहटुँ ।

सागर कुस्मी

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