हमार थारुनके पहिचान

राजेश अंगरहुवा
४ आश्विन २०७८, सोमबार
हमार थारुनके पहिचान

हमार थारुनके पहिचान

नेपाल एकठो बहुजातिक, बहुभाषिक, बहुसंस्कृतिक ओ बहुधार्मिक देश हो । नेपालम् बैठुइया हरेक जातिनके अपन अपन मेरके भेषभुषा, लवाइखवाइ, बोली चाली ओ धर्म संस्कृति और अपन अपन ठाउँम् सक्कुहनके पहिचान बटिन ्। नेपालमे संख्याके आधारमे १२५ जात ओ १२३ भाषामनसे थारु जातफें एकठो हो ।

थारु नेपालके आदिवासी जात हो । जनसंख्याके आधारमे थारु जात बैठुइया कलक तराइ क्षेत्र हो । यि जातहे नेपाल सरकार लोक जातके रुपमे मान्यता डेहेल बा । थारु जात नेपाल लगायत भारतके बिहार, उत्तर प्रदेश, उत्तराखण्ड ओ नेपालके दाङ, चितवन, सुर्खेत, कैलाली आदि लगायत नेपालके २३ जिल्लामे फैलल् बसोवास कर्टि आइल बटैं । यि तराइमे सबसे ज्यादा जनसंख्या रहल जात हो । अस्टेके यि थारु जात कैंयो बरस आघेसे तराइ क्षेत्रके भारीभारी बनवाँके बिच बिचमे बसोबास कर्टि आइल जात हो । दाङमे थारु जातिनके राज्य रहल प्रमाणफें फेला परल बा । डंगीशरण राजा दाङमे राज कर्नै कना इतिहासमे भेटाजाइठ् । दाङमे बैठुइया थारुन् डंगौरा थारु कहिजाइठ् ।

थारु जातके मनै आकृति (बनावट) ले मंगोलियन डेखैलेसेफें डख्खिन ओरीक् आर्यनके सम्पर्कमे रहल कारणसे जनजीवन ओ रहनसहन एकदमै फरक डेखाजाइठ् । ठाउँ अनुसार थारु जातके भाषा ओ थरमे फरक–फरक बा । भौगोलिक विभाजन अनुसार कोचिला, सप्तरीया, लालपूरिया, सोलरिया, मर्दनिया, कडरिया, मोरगिंया, राजहटिया, चिटवनिया, रौतार, मझौरा, दाङ बर्दिया, खस, लामपुछूवा, बुचविहारी, डंगौरा अन्य मेरके थर थारु समुदायमे भेटाजाइठ् । थारुनके परम्परा अनुसार पूर्वसे पश्चिम समके थारुनके अपन अपन भाषा सांस्कृतिक पोसाक बटिन् । ओस्टेके थारु जातिनके मनैना प्रमुख टिहुवार जस्टे माघी, जितीया, डस्या, डेवारी, हरेरी पूजा, अस्टिम्की, अँट्वारी, गुरही, अन्य फें बा । ओस्टेके थारुनके पौराणिक खेल जस्टे छुर, गुल्ली, गुल्ली डन्डा, कब्डी, बल्हा, नुक्का, घर सटवर अन्य फें रहल बा । थारुन्के प्रमुख लोकबाजाफें एकदम संस्कृति झल्काइठ् । जस्टे सखिया मन्द्रा, झुम्रा मन्द्रा, कारा, टिम्की, ठेकारा, बैंसी, मझौरा, मनार, मुरली, टमौरा, डफ, झाइफल, पिंगरी, बसिया, माटिक बाजा कस्टार, चट्कौली, डफ अन्य लोक बाजाफें रहल बा । थारुन्के खानपिनके परिकार जस्टे ढिक्री, घोंघी, जाँर आदि मिठ मिठफें रहल बा । थारू जातके मनै बोल्ना भाषा कलक थारु भाषा सहित भोजपुरी, मैथिली, अवधि ओ नेपाली भाषाफें क्षेत्रगत रूपमे बोल्ना भाषा हो । थारू जात अपन संस्कृतिमे रमैना जात हो । पारिवारिक रुपमे टिहुवार मनाइ बेर थारु जातमे डेवहर इष्ट डेवताके पुजा कर्ना चलन बा । थारुनके मृत्यु संस्कार क्षेत्र अनुसार फरक फरक भेटाजाइठ् । पूर्वी तराइके थारु लास जरैठैं कलेसे पश्चिम तराइके थारु हुक्रनके माटिम् भठर्ना चलन बटिन् । लास भठारे बेर लवन्डा हुइलेसे घोप्टाके ओ महिला हुइलेसे उठाके भठर्ना चलन रहल बा ।

अन्तमे थारुनके विशेषता कलक एकठो इमान्दार जातसे चिनारी जात हो । थारु हुक्रे मिसाज, सरल, इमानदार ओ मेहेनती जात हो । पुरान एकठो भनाइ बा जे ‘शास्त्र हेराइ टे संस्कार हेराइठ्, संस्कार हेराइ टे संस्कृति हेराइठ्, संस्कृति हेराइ टे मनैनके अस्तित्व हेराइठ् ।’ टब सक्कु नेपाली हुंक्रे अपन अपन संस्कृतिहे बचइना ओ जोगाके ढर्ना अभियानमे लग्ना जरुरी बा ।
राजेश अंगरहुवा

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राजेश अंगरहुवा

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