पहिचान खोज्टि बाघनाठ बाबा (जंगल कुट्टी)

लक्की चौधरी
५ आश्विन २०७८, मंगलवार
पहिचान खोज्टि बाघनाठ बाबा (जंगल कुट्टी)

पहिचान खोज्टि बाघनाठ बाबा (जंगल कुट्टी)

आझसे एक सय ९८ बरस पहिले हालके गोबरडिहा ८, दाङमे भुवनेश्वरनाठ थारु जंगलके बिचोबीचमे एकठो कुट्टी स्थापना कैले रहिंट । ओहे गाउँके उल्टाहा थारु टे बाबाहे कुटी बनाइ ओहाँ बैठ्ना सहयोग कैले रहिंट । वि.सं. १८७९ मे उ बाबा कुटी स्थापना कैल इतिहास बा । बाबा शिव भगवानके परम भक्त रहिंट । उहाँ स्थापना कराइल कुटी जो अब्बे जंगल कुटीके नाउँसे परिचित बा । ओहे बाबा बुटवलके चारपाला क्षेत्रसे आइल गाउँक् मनैन बटइले रहिंट । नाउँ भुवनेश्वरनाठ हुइलेसे फेन उहाँहे गाउँमे बाबाके नाउँसे जानिट । उहाँ एक कुशल बैद्य रहिंट । ओहेबेला अंग्रेजी औषधिमुलोके व्यवस्था गाउँमे नैरहे । गाउँके मनै बिमार हुइलसे, दुःख संकट आइलबेला ओहे बाबासे जरीबुटी ओ झारफुँकसे उपचार करिंट । गाउँमे भारी महामारी आइल बेलासम बाबाहे ओहे निराकण करिंट । गाउँले ओइनहे सहयोग कर्ना हुइल सम उहाँके मान ओहे क्षेत्रमे अचाक्ली बर्हल । गाउँके मनैनहे उहाँहे संरक्षक ओ डेवटाके रुपमे मानिट । हुइना फेन उ बाबामे अदृश्य शक्ति रहे । बघुवकमे सवार होके गाउँ नेंगघुम करिंट । ओहेमारे उहाँके नाउँ बाबा बाघनाठ ढारगैल । अब्बे ओहे सिद्ध बाघनाठ बाबाके नाउँ डेहल बा । गाउँघरमे परम्परागत रुपमे जंगल कुट्टी कैह्के बुझगैल बा ।

ऐतिहासिकता
करिब दुई सय बरस अघिके कुट्टी हुइल ओरसे ओहे फेन ऐतिहासिक हुइना जो हुइल । ऐतिहासिक ओ धार्मिक हिसाबसे फेन ओकर गरिमा बर्हटि बा । पुरुबमे चिमचिमे कुल्वा, पश्चिम सुपैला कुल्वा, डख्खिन डडुवा पर्वत ओ उत्तरमे गोबरडिहा ओ ढैरेनी थारु गाउँके बीचमे अवस्थित जंगल कुट्टी ओहे क्षेत्रके प्रमुख धार्मिक स्थलके रुपमे परिचित बा । मने जैसिक ओकर ऐतिहासिकता ओ धार्मिक महत्व बा, ओहे स्तरके पहिचान बनाइ नैसेकल हो । दाङ आदिबासी थारु समुदायके उदगमस्थल मानजाइठ् । दाङडेउखर उपत्यकामे प्राचीनकालसे थारु समुदायके बसोबास बा, अद्यापि बा । थारु गाउँके जंगलमे कुट्टी रहल ओकर प्राचिनता ओस्टे फेन झल्कठ् । पहिले तराईमे आदिबासी थारु बाहेक औरे फेन बसोबास नैरहे । तराईके घन जंगल फाँरके बैठ्ना योग्य बनाइन थारु जाति जो रहिंट । मानवबस्ती डेखल ओरसे भवनेश्वरनाथ अपने थारु हुइल हैसियतमे उ ठाउँ छनौट कैल हुइही । भुवनेश्वरनाथ अपन ओहाँ बैठ्ना ढेर चेला बनैले रहिंट । चेला सक्कु थारु रहिंट । कारण, ओहेबेला थारु बाहेक आउर जातिके बसोबास नैरहे । उहाँके शेषके बाड अपन थारु चेला सन्तान डरसन्तान उ कुट्टीके संरक्षण करटि अइलंै । अद्यापि थारु जो ओकर संरक्षण ओ पुजापाठ करटि आइल बटैं ।

धार्मिक पहिचान
प्राचीन धार्मिक स्थल हुइलक ओरसे पहिचान पुरान बा । नेपाल ओ भारतके भक्तजन यहाँ धार्मिक कामके लाग अइठैं । विशेष कैके थारुके टिहुवार माघ, शिवरात्री, डसिया ओ मेला महोत्सवमे जंगल कुट्टीमे भक्तजनके भिर लागठ् । मजा डगरके व्यवस्था नैहुइलेक ओरसे भक्तजन डग्रीमे भुलैना समस्या आइसेकठ् । जंगलके बीचमे हुइलेक ओरसे एकले डुकले ओहाँ जाइ फेन भक्तजन डरैठैं । डगरमे जंगली जीव जानबर ओ अपराध काम कर्र्ना मनैनके डर भक्तजनहे हुइठिन । यद्यपि अब्बेसम जंगली जीव जानबर भक्तजनके नोक्सानी फेन नैकरल स्थानीयके बुझाइ बा । डगर भुलाइल भक्तजनहे बाघनाथ बाबा अपनहि बघुवक अवटार लेके डगर डेखैना काम करटि आइल कुट्टीके पुजारी डेवीसिंह थारुके कहाइ बा । ‘कुट्टी जंगलमे हुइलक ओरसे जीव जानबर अइना मनैनके बुझाइ बा । मने ओकर नैहो, बाघनाथ बाबा जो अब्बे बघवाके अवटारमे, अब्बेहे सपुवाके अवटारमे टे कबु औरे जीव जानबरके अवटारमे भेटाजैठैं’ पुजारी थारुहे फेन, ‘भक्तजनहे अब्बासम नोक्सान ओ दुःख हुइल नैपाइल हो, डगर भुलाइल बघवाके अवटारमे बाघनाथ बाबा अपने डगर डेखैठैं, ओहे उहाँके धार्मिक शक्ति हो ।’ अपनहे अपनही बारबार सँपुवाके रुपमे दर्शनभेंट हुइलैं मने कौनो फेन हानी नोक्सानी नैहुइल पुजारी थारुके कहाइ बा ।

भक्तजन ओइने सन्तान भेटैना, दुःखसे छुटकारा पैना, दुःख बिमार भगैना ओ श्रीसम्पत्तिके जोरक लाग मनौटा कैके बाघनाथ बाबाके दर्शन करठैं । मनौटा कैके घुमठंै । पुरा हुइल बाड फेर दर्शन करे अइठैं पुजारी थारु बटैलंै । थारु डेवटाके रुपमे पहिचान बनल हुइल ओरसे अब्बेसम बाघनाथ बाबाहे सिकार, डारु, खीर, मिठाइ लगायतके सामग्री चरहैना हुइल पुजारीके कहाइ बा । सान्झ बिहान अपने पुजा कर्ना ओ समय समयमे भजनकीर्टन ओ प्रवचनके आयेजना कर्ना उहाँ बटैलैं । यिहिनसे आघे अपन बाबा जेडुराम थारु पूृजारी हुइलेसे फेन २०३१ सालसे हालसम अपनहे नियमित पुजा ओ संरक्षणके जिम्मेवारी लेहल उहाँ बटैलैं । बाघनाथ बाबाके संरक्षण ओ पुजाके लाग ढेर पुजारी आइल फेन बाघनाथ बाबाहे चाहलसम किल ओहा टिक्ना सेक्ना उहाँक बुझाइ बा । बाघनाथ बाबाहे चित्त नैबुझलमे कयौं रुप धारण कैके दुःख डेना ओ डर त्रास डेखके पुजारीहे स्थापित कर्ना कैल बा । पुजारी डेवीसिंह थारु कठैं, ‘पुजापाठ ओ स्याहारमे चिट्बुझाके बाघनाथ बाबाहे सक्कु मजा करठंै, चिट् नैबुझलमे बहुट दुःख डेके विस्थापित कैगैल बा । पुजापाठमे ठोरचें डाहिन बाउँ हुइलेसे परिवारके सदस्य ओइनहे बहुट दुःख बिमार लागठ ।’ बाघनाथ बाबाहे चाहलसम अपन फेन कुट्टीके संरक्षण ओ पुजापाठमे रहना हुँकार बुझाइ बा ।

कट्ुटीमे बाघनाथ बाबाके मूर्ति नैहो । उहाँहे प्रयोग करल खराउ, शंख, कमन्डलु आदि फेन बा । टबमारे बाघनाथ बाबाके मूर्ति स्मरण कैके नियमित पुजापाठ कैजाइठ् । समय–समयमे गाउँबासी ओ भक्तजनहे बाघनाथके टमान रुपमे प्रत्यक्ष दर्शन पैलेसे उहाँके शक्ति जीएल रहल पुजारीके कहाइ बा । ‘हम्रे अपनहे टमान स्वरुपमे बाबाके दर्शन पइटी बटि, उ उहाँके शक्तिहे प्रत्यक्ष जीएल अनुभव कराइठ’् पुजारी थारु स्मरण कैलैं । टब बाबा बाघनाथहे जंगलके बीचमे कुट्टी बनाइल कैह्के तत्कालिन प्रशासनहे पकरके ठानामे लैजैना फेन बाबा अपनहे छुट्के अइठैं । जट्रा ठुनलेसे फेन उहाँहे ठुने नैसेकना रहे फेन किंवदन्ती रहिके पुजारी सम्झठैं । बघवामे सवार होके नेंगघुमके बाबा बाघनाथ एक अदृश्य शक्ति हुइलेक ओरसे जे फेने उहाँहे प्रत्यक्ष डेखे नैसेक्ठै । जोन मनैनहे बाबा डेखाइ चाहल रहे उ किल उहाँके प्रत्यक्ष अवलोकन करे सेक्ठैं पुर्खा ओइने बात बटैना पुजारी थारु सम्झठैं ।

भौतिक संरचना
‘जंगल कुट््टी’ धार्मिक स्थल लमही बजारसे करिब १९ किलोमिटर डख्खिनमे अवस्थित बा । पुरुव–पश्चिम राजमार्गसे सिसिहनियाँ गाउँ हुइटी ओहे बेला डुरी पार कैके फेन जंगल कुट्टी पुगेसेकजाइठ् । धार्मिक बनवाँके नाउँमे अब्बे ९ बिघा जमिन टारबार कैके संरक्षण कैगैल बा । टबेमारे उ औपचारिक रुपमे धार्मिक बनवाँके मान्यता पाइ नैसेकल अवस्था बा । मन्दिरके नाउँमे जग्गा दर्ता नैहो । टबमारे छोट कच्ची कुट्टीमे रहल धार्मिक स्थल अब्बे पक्की निर्माण कैगैल बा । नेपाल पर्यटन बोर्डके सहयोग ओ स्थानीय सांसदके संसदीय कोषके लगानीमे एकतासे पक्की भवन निर्माण कैगैल बा । पहिलेक तुलनामे कट्ुटी बलगर ओ चाकर बा । बैठ्ना व्यवस्थित अंगना ओ खानेपानीके व्यवस्था कैगैल बा । पुरान कुट्टी नैभट्काइल ओ ओकर संरक्षण करटि पक्की भवन निर्माण कैगैल बा । बाबा बाघनाथके समाढी स्थल फेन भिट्टर बा । ओहे समाढी किनारमे बाबाके खराउ, कमण्डलु, शंख ओ उहाँहे प्रयोग करल औरे सामान बा ।

जंगल कुट्टीहे थारु समुदाय डेउठानके रुपमे फेन चिन्हजाइठ्् । टबमारे वास्तविक पहिचान जंगल कुट्टीके नाउँसे बनल बा । कुट्टीसम पुग्ना डगर कच्ची बा । ठाउँ ठाउँमे समान्य पठ्रा डार गिलेसे फेन पर्याप्त नैहो । डगरमे भारीभारी रुखवा बा । बर्खाके बेला गाडी लेके उहाँ पुग्ना भक्तजनहे भारीे साँसट बा । पूर्वमन्त्री ओ राजपरिषदके सभापति पर्शुनारायण चौधरीके गाउँ ईलाकामे जंगल कुट्टी अवस्थित हुइल ओरसे भौतिक संरचनामे खासे ओकर योगदान नैडेखजाइठ् । प्रचारप्रसारके कमीेसे फेन बाघनाथ बाबाके पहिचान ओझेलमे बा । चौधरीके गाउँमे आलीशान भवन बा । उहाँके सिंहदरवारके नाउँसे परिचित भवनके कौनो डुर अवस्थित जंगल कुट्टीके संरक्षण नैहुइल हो । उ क्षेत्रके प्रमुख धार्मिकस्थलके नाउँसे परिचित जंगल कुट्टीमे सरकारी लगानी नैपुगल हो । ना टे सरकार उहीहे पहिचान करे नैसेकल हो । ओहे कारण बाघनाथ बाबाके पहिचान अभिन फेन बने नैसेकल हो ।

सुझाव
दुई सय बरस पुरान प्राचीन इतिहास बोकल धार्मिक स्थलके पहिचान राज्य करे नैसेक्ना दुःखद हो । अब्बे देश संघीयतामे गैल बा । तीन तहके सरकार बनल बा । प्रदेश ओ स्थानीय सरकार जंगल कुट्टीके धार्मिक पहिचान कायम करना आवश्यक लगानी बरहैना जरुरी बा । हमार व्यवस्थित लगानी कैके उ क्षेत्रहे धार्मिक पर्यटकीय स्थलके रुपमे विकास करना आवश्यक बा । रमणीय प्राकृतिक सम्पदासे भरिभराउ रहल जो क्षेत्रहे व्यवस्थित बनाइ सेकलेसे वार्षिक लाखौं पर्यटक भिट्राइ सेक्जाइ । टबमारे स्थानीय स्तरमे आर्थिक प्रवद्र्धनके ढोका खुल्ने रहे । पुरुव–पस्छिउ लोकमार्गसे लग्घे रहल ओरसे फेन डगर निर्माण कर्नामे खासे भारीे लगानी करे नैपरने रहे ।

जंगलके बीचमे हुइलेक ओरसे उ क्षेत्र सरकारी वनवाँमे अवस्थित बा । उहीहे धार्मिृक वनवाँके नाउँ डेलेसे फेन औपचारिकता पाइल नैहो । कुट्टीके नाउँमे कौनो सरकारी प्रमाण प्राप्त नैहो । ओकर संरक्षणके लाग फेन उ क्षेत्रहे धार्मिक बनवाँके रुपमे दर्ता कर्ना अनिवार्य बा । भक्तजनके लाग स्नान कर्र्ना पोखरी, प्रवचन कर्र्ना सभाहल, ध्यान केन्द्र ओ आवटजावटके लाग डगर निर्माण अनिवार्य बा । अब्बेसम थारु समुदायके पुजारीे संरक्षण ओ पुजापाठ करटि आइल ओरसे उ कुट्टीके प्रमुख संरक्षणके लाग थारु पुजारी जो नियुक्तीके वैधानिक व्यवस्था करेपरठ् । ढेर धार्मिक स्थलमे परम्परागत पुजारीहे विस्थापित कैके ओरे समुदायके पुजारी नियुक्त कर्र्ना राजनीतिक चलखेल डेखगैल बा । जंगल कुट्टी थारु निर्माण करल कुट््टी ओ पुजारी फेन शुरुसे थारु जो हुइलेक ओरसे ओकर संरक्षणके हक फेन थारुनके लागठ् । जंगल कुट्टीके संरक्षण ओ विकासके लाग सरकारी टवरसे आर्थिक खर्चके व्यवस्थापन ओ स्थानीयके नेतृत्वमे संरक्षण समिति गठन कैके काम करेसेकना विकास ओ संरक्षणके काम गति लेहेसेकठ् । लुम्बिनी प्रदेशके स्थायी राजधानी ओहे क्षेत्र डेउखरमे निर्णय हुइल ओरसे अब्बे उ क्षेत्रके विकास हुइनामे आस फेन करना ठाउँ बा । उहे प्रदेश ओ स्थानीय सरकार ओ स्थानीय गाउँबासी समुचित ध्यान डेहेपर्ना बा ।

लक्की चौधरी

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लक्की चौधरी

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