ऊ के रहे ?

बिनिता चौधरी
७ आश्विन २०७८, बिहीबार
ऊ के रहे ?

ऊ के रहे ?
ओजरिया रात, सक्कु ओर ओजरार, डेवारीक समय, चक्ढौं चक्ढौं मन्डरक आवाज मोर निंद नैपरटहे । किहुसे बोलक बट्वाइक लाग टे सबजाने डेवारी मन्नम व्यस्त रहिँट । बाबा मट्वार होके सुटल रहे । डाडु भइवन अपन सँघरियनसँगे नाच हेरे गैल रहिँट । डाइ मामन् घर डेवारीक् टिका लगाइ गैल रहे । मै अक्केली कोन्टीम ओन्ड्रल रहुँ । मोका डगर जोन्ह्यँक ओजरार कोन्टीम झाँकटेहे । मानो महिन बलाइटा, अपनसँगे खेले । मैं उठ्लुँ खटियाहे घिरियाके मोकक् सोझे टन्लुँ ओ सुट्गैलुँ । निंद नैपरल । मुरी उठाके मोका डगर बाहेर हेरे लग्लुँ । आँखी सिधे जोन्ह्यँक पर परल । निस्छल अनहारसे मुस्कानके रुपमे ओजरार फैलैटी चम्चमैटी पहिरनमे जोन्ह्याँ झलर मलर टोंरैयनके बिच्चे मानो स्वर्गके परी सजसवँरके अपन सखीन्सँगे सयरमे निकरल बा ।

भरलपुरल जोन्ह्याँहे डेख्के केकर मन नैलल्चाइ । सायद उहे मारे हुइ उत्तरक कोन्वँमसे बड्री अपन अलगअलग आकृति बडल्टी ढिरेढिरे आइल ओ जोन्ह्याँहे अपन कोनामे नुक्वा लेहल । मै निरास होगैलुँ । महिन लागल, केउ मोर मन मिल्ना संघरियाहे महिसे डुर कइडेहल । मै मनमने गरियाइ लग्लुँ कि टब्बेहेँ जोन्ह्यँक ओजरार ढिरेढिरे बाहेर निकरे लागल । जानो कि उ महिसे आँख मिचौली खेलटा । कबु चारुओर ओजरार फेंके टे कबु अन्ढार कैके बड्रीक कोनामे नुक्जाए ।

‘बाबा’ कना आवाजसे मै अपन कल्पनाके संसारसे बाहर आके हेरलँु टे बाबा बेखवर होके सुटल रहे । मै उठके खटियामे वैठ्लुँ ओ डाइहे सम्झे लग्लुँ टे बुडिक कहलक बात याडठ आइल, ‘अरि हमार घर का खैना पिनक डारी बा, टरटिउहार आइठ टे अपन लैहर जाउँ जाउँ कैठे । घरेम आइल पहुनी पहुनन् मजासे खवाइक पिवाइक टे जब फें टाँग उठैले डेख्वो ।’ बुडिक जियट घरिम डाइ कब्बु मामन् घर नैजाइ पाए । कबुकबु किल जाए । उ फें नानी डेरा ढैले रहे टब्बे किल । सक्कारे निंढ पकाके, ढन्ढा उसारके जाए, फेन सन्झा बेरी निंढ्ना जुन आ जाए । मामन् घर एल दुर फें टे नैहो । कुल्वक ओँहपार डुइ घर छोरके टे हो झे ।

जब टिउहार आए टे डाइ डिनभर भन्सम डट्करल रहे । बुडि अँगना मनिक रुखुवाटिर बैठल डोना छेडे ओ फुइनसे बट्वाए । बिचबिचमे डाइहे गरिया लेहे । ‘अरि सेक्ले कि नाइ भुँखे मुवा डारी आझ बाबुन् हे’ । डुन्या डारीसे बेखबर डुनु फुइनके लर्का ओ हम्रे तीनु भइवा बहिन्याँ डोन्यम् खैना बोक्ले अँगनामे नेँगनेँग डिनभर कट्रा खाइ, जोखे नै सेक्जाइ ।

जब रात होए, टब सक्कु जाने सुट्जाइँट टे डाइ ‘बाबु री, बाबु निंडा गैले ? सुग्घुरसे सुट् यी लवन्डी सुट्टि किल निंडा जाइठ । मोर मुरी सुहराए ओ कहे, ‘वहाँ टोर मामन् घर सक्कुजाने गल्गलाइठुइहीँ, जट्रे रात हुइठ ओट्रे टोर नानीक् पुरान पुरान बाट निकरठिस् । ओम्हे टोर छुट्की मौसी छप्या डारठुइ टे सब जाने हहराइठुइहीँ ।’ डाइक हाँठ उस्टाके मै कहुँ–‘ना बोल डाइ, सुटेडे अइसिन निंड लागटा ।’ मोर बाट बिन ओनैले डाइ अपन बाट बरबराइल करे । कैना फें का करी बिचारी, सुखदुःखके बाट बटुइया मनै फें टे चाहल । बुडु मुअल टबसे घरक जिम्मेवारी सक्कु बाबक् मुरीमे रहिस । डिनभर खेटवम् काम करे । सिहरल साँझके जब घरे आए टे जाँरक मिझ्नी खाके सुटे । टब एकफाले सक्कारे उठे । सारीकसाह टे मै डाइक सँगेसँगे रहुँ । सबजाने कहिंट, पेट पोछ्नी छाइ अइसिन छिहलाइल बटिन, डाइहे अक्को छोरे नैसेक्ना । हुइना फें हो डिनभर टे मै एहाेंर ओहोर खेल लिउँ, मने रातके भर डाइहे बिना पकरले मोर निंड नै आए, अभिनटक नैआइठ ।

उहेमारे हुइ आझ फें मोर निंड नैआइठो । डाइ टे कहटेहे ‘चोल छाइ जाइ मामन् घर, काल्ह सक्कारे आजाबी । टिनाटावन सक्कु चिज पलि बा, एक भोक्टी जाँर छाबडेब, टोर बाबा गाउँ ओरसे डेवारी मानके अइही टे खापिके सुट्जैही ।’ मै कलुँ–‘मै नैजैम टैं जा, वहाँ सक्कु जाने आइल हुइहीँ । अब्बे टे मामा खिझ्वाइ लग्हीँ, ‘भैने कैसिन डुल्हा लेबो, पैन्ट घल्नाहा कि लगौंटी पेहल ? डुर कि लग्गे ? कुर्सीम बैठ्नाहा कि हर जोट्नाहा ?’ का का हो का का मामा टे रुवइनाहस् कै डरठाँ । अस्टे बानी होके टे गाउँक मनै सोँग्या चौधरीयक् नाउँसे चिन्हठिन् ।
रात बह्रटी गैल । जोन्ह्याँ मोर कोन्टीक मोकाओरसे बिल्गाइ छोरडेहल, कोन्टी अन्ढार होगैल । अंगनाओर जुन आउर ओजरार बिल्गाए । मै उठ्के अँगनाओर गैलुँ । टवाटिक ओजरार डेख्के डाइक् ठेन जैनास लागे लागल । घरे मजाके बहरीम ढैल चप्पल घल्लुँ, लावा गटिया परलँु ओ डवार भट्काके चल्डेलुँ ।

गाउँमे नाटक हेरुइयनके चहलपहल रहे । हलिहलि नेंग्टी डख्नक बाँसेठें पुग्लुँ टे, लागल केउ मोर पाछेपाछे आइटा । मै हँस्याइ हस कैलुँ टे केक्रो चालचुले नै । मोर जिउ ठरठराइ हस् करल । टबुपर आँखर मन कैके आघे बह्रलुँ । दुई तीन पैला का नेंग्लुँ फेरसे ओस्टे चाल । के हो कैहके नेंग्टी टिर्छेसे पाछेओर हेरेहस कैलुँ टे झुक्मुकाइट डेख्लँु । मोर सास फुले लागल । मै आँख बन्द कैके डौरे लग्लँु । मैं जस्टेक डौरुँ, उ फें ओस्टेके डौरे । बिचबिचमे मोर गटिया पकरके टाने हस करे । मै चिल्लैटी कब मामन्के अँगनामे पुग्लुँ, पटे नैचलल् ।

के हो ? के हो ? का हुइल ? का हुइल ? आवाज सुनके मोर होस आइल । सक्हुन अँगनामे ठरह्याइल डेख्लुँ टे डरैटी ढिरेसे कलुँ ‘कने के जाने हो महि डुरुवाइटेहे ।’ मामक् छावा बर्का डाडु ‘के हो रे ? केकर हिम्मत बा मोर बहिन्यँक पिछा कैना ? खै केहोर भागल सारेक’ कहटी गाउँओर चलगैल । माइ भुन्भुनाइ लग्ली ¬‘भैने फेन, लवन्डी मनै रातविरात अक्केली नेंग्ना कुछु हो ओजाइट टे ?’ बाबु कहल– ‘अइया डाइ री, उहे डख्नक बाँसे ठन टे भुटुवा निकरठ कटिहुँ ।’ सबके बाट सुनके डाइ कहल–‘मै कटि टे रहुँ, चोल संगे, मन्बे नैकरल, आब नैअक्केली आइक परल । चोल सुटे कुछु नैहुइ, काल्ह सक्कारे गैरान टोर बुडुसे आछट हेराडेम ।’

मै डरैलक् घटनासे सक्कुजे अपनअपन बात पकरले रहिँट । केउ का कहे, केउ का । मै घरक भिट्टर जाइकलाग अपन लुग्गा झराइ लग्लुँ टे पाछे गटियक् झब्बामे अट्कल बाँसक् झंगली भेटैलँु । उहि छुटाइक लाग लिहुरलुँ टे अपन बौनी झुकमुकाइट डेख्लुँ । टब मोर समझमे आगैल कि उ के रहे ।

मोर गटिया टनुइया ओ पछेरा करुइया भुटुवा आउर केउ नैरहे, मोरे बौनी (छाँही) ओ बाँसक् झंगली रहे । अपन उप्पर अपनहि हँस्टी गटियम् अट्कल बाँसक् झंगलीहे एक लजर हेरके अँगनामे बगैलँु ओ मुस्कुरैटी डाइक् संगे भिट्टर चलडेलुँ ।

ओहोर गल्लीम् डेवहरिया मन्ड्रक मेरमेरिक खोट बज्टी रहे । मै जुन डाइक् संग भेटैटी कि पठरीम नाक बजाइ लग्लुँ । कानेकाने डाइक् आवाज सुन्लुँ–‘बाबु री, बाबु निंडा गैले ? सुग्घुरसे सुट्, इ लवन्डी एल सुट्टी किल निंडा जाइठ टे का ।’
बिनिता चौधरी

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बिनिता चौधरी

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