नारीन्के जात

रामचरण कुश्मी चौधरी ‘एकल यात्री’ 
१४ कार्तिक २०७८, आईतवार
नारीन्के जात

दुःखी जीवनहे हाँसके फे बितैनी नारीन्के जात ।

हेल्हा हुइल ठाँउमे हक नै पैना नारीन्के जात ।।

परतिन् औरेक इसारम् चले यी कैसिन जिन्गी ।

 मनै होके फेंन काहे डरैना नारीनके जात ।।

यातनासे भरल बतिन जीवन दुःखसे सजल बतिन् । 

काटैसे किल घेरल ठाँउमे अटैना जिना नारीनके जात ।। 

शिक्षा दुर बतिन करिया भाँडा लग्गे बतिन् ।

जोन्हियाँ हस् फे दुःख लजैना नारनिके जात ।। 

कलमके नाउँमे चद्धतुवा दब्ला गुज्ना घुमाइ पर्ना । 

सुप्पाहे किताब बनाके चाउरहे केरैना नारीनके जात ।।

–रामचरण कुश्मी चौधरी ‘एकल यात्री’ 

नारीन्के जात

रामचरण कुश्मी चौधरी ‘एकल यात्री’ 

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