अइ ! मोर मनरखनी टोहाँर यी………?

–छविलाल कोपिला
१८ आश्विन २०७८, सोमबार
अइ ! मोर मनरखनी  टोहाँर यी………?

निबन्ध


करिब ३ बरसके बाद मोर मैगर मनरख्नीसे भेट हुइना मौका मिलल् । जब हुँखिनसे भेट हुइल् । ऊ बरा निरास, निरस ओ मनमर्ले रही । हुँखिन डेख्के महिह बरा तीठ लागल् । सोह्रौ सिंगरसे सुसज्जतित ऊ आझ पटपटाइल्, चिठ्रार, भक्भुन्डरार रहिन । ऊ मोर मन दश बरस पैह्ले चोरैले रहिन नै जन्टिक । मै हाँेंकर सुन्दरता, चञ्चलता शित्तर भावुक स्वभावसे मोह्न्याँ गैलुँ । टब्बेसे मोर लग सब कुछ उहे मोर मैगर मनरख्नी रहिन । हर बात, हर रात होँकर सपनामे मै हेरागैँलु । कही सक्कु जिन्गी आब होँकारे शिरपर ढैडेलुँ ।


कबो छुट्ना, कबो जुट्ना, हाँस–खेल कैना, मनके बात सुनैना ओ सुन्ना मानवीय स्वभाव, उहेक मारे हमार भेट कैयौं फेरा हुरख्ले रहे । भेट हुइना,गहींर सदभावमे बुर्ना,गहींर अनुभुतिके साथ गहींर–गहींरके अभिन मोह्न्यैना, ओस्टक् छुट्टीकिल यी संसार छुटलहस् लग्ना,सब कुछ गँवाइलहस् लग्ना ओस्टक् ढिरे–ढिरे बिस्रैना,कबो सम्झलेसे झस्कना, ज्यादा भावनामे बहलेसे भावुक बन्टी आँस चुहैना ओ रोइना,कबो खुसैना ओ मनभरके हँस्ना अस्टे बिटल दिन ।


मुले, आझ ऊ महींसे ढेर बट्वाइक नै चहली । सोझ लजरसे फेन नै हेर्ली । ना टे चौकससे बोलबाडी कैली । हुँखिनहे मनमर्ले डेख्के मोर मन पैह्लेहेँ छनक् गैल । हुँखिनहे मनमर्ले डेख्के मोर मन पैह्लेहँे छनक् गैल । मै हाँेकर दयनीय हालत डेख्के हुँखिनसे सब कुछ पुछे नै सेक्लुँ । मने हुँकार सुसार करुइया एक जनहसे पुँछ्लुँ बहुत आँट कैके । ऊ जवाफमे ‘का कहुँ हजुर होँकर हालत डेख्के हमार फेन मन रोइठ् । मुले का करबी ?’ ऊ निराश मनले कलाँ । बात आघे बर्हैटी ऊ फेन कह्लाँ ‘भाँडा उहे हो, चाउर उहे बा नोन तेल उहे हो । फरक निधुइया किल बटाँ । उहे मारे कबो नोन्नाहाँ, कबो गिलकच्चहा कबो कैसिन, कबो कैसिन कैडेठाँ । कहाइक मतलब होँकार सुसार कैना मनैन होँकार खान पिनमे ढियान पुगाई नै सेक्के ओ होँकर मनके बात बुझे नै सेक्के ऊ ढिरे –ढिरे डुब्रैटी गैली । आझ ऐसिन हालतमे जियटी । विचरी ! हमार मन फेन खोब रोइठ, मुले का करबी ? हमार हाँठेम् टे कुछ नै हो ।’ ऊ सक्कु बात एक्के चोटिक निम्जैलाँ ।


मै अपन मैगर मनरख्नीहे एक फेरा गहंीरके हेर्लु । मै होँकार हालत डेख्के शिर लिहुरालेलुँ । ऊ गम्भीर भाव डेख्के हुई लजर झुका लेलिन । मै अभिन निराश बन्गैलुँ । सोह्रौ सिंगारसे स्वर्गके रानी सरिख्खा मोर मनरख्नी, आझ असिन हालटमे गल्ली नेँगना पग्लिनियाँ हस बिल्गैठी । घेचाभर मेर मेरिक चन्दरहार, हारमे जोरल मेरमेरिक जुवाहरत, मुन्गा, पट्टर, सिक्री । ऊ फे सिलसिलैना, चम्कन्हाँ ओ झिलमिलैनाहाँ । शिरपर बेली, चम्पा, चमेली गुलाव, बगमबेली छन्दिक छन्कि फुला,बिना अट्टर सोहे सुहावन वास, सुवाससे मनुषके टन ललच्याइन होँकार सुन्दरतामे । टब्बे टे लाखौँ मनैनहे बिना बिस अपन मोहित सौन्दर्यमे मुर्छाइन मोर मनरख्नी । हर दिन परेवनक् जोरी,बाल–बच्चा टे का, सयान बुर्ह पुरिनिया होँकार सुन्दरतामे मोहित हुइठाँ । मुले आझ ऊ ओइसिन नै हुई ऊ । मे होँकार दशा डेख्के आँस चुहाइटँु, टपसे आँस जब भुँइयामे चुहठ,मै टकपक टकपक यहोंर ओँकार हेठुँ,क्यो डेखल की,कैह्के ? आँजर –पाँजर किहुहे नै डेख्ठु । मोर मन अप्नेहे शान्त हुइठ् ओ उहे भावमे बहेलग्ठँु ।


जब मोर पहिल भेट हुइल, हुँकार चेरियन (स्याहार सुसार करुइयन ) २१ ठो जन्नी,२१ ठो ठारु ओ आउर करमचारी रहिंट् । नुक्लीपुर ओ बंगलापुरके ऊ सक्कु जाने मुक्त कमैया परिवारमे थारु समुदायके गरिब मनै रहिंट । ओत्र जन्हुनके स्याहार सुसारसे होँकार कौनो कमी नै रहिन । विडम्वना आझ ऊ अवस्था नै हो । ऊ सककु कमैया परिवार निकरवा पागैलाँ । ओइनके ठाँउमे राजनीतिक दलके मनै लोग आपन मनैं ढैले बटाँ । ऊ फेन सीमित संख्यामे किल । जेकर कारणसे होँकार सुसार टे का हुखिन भेट करुइया मनै फेन सन्तोष हुइ नै सेकल हुइट ।


२१ घर परिवारके आझ विजोग बटिन, ओइनके लर्का पर्कनके पर्हाई लिखाइहे लात मारके जौन मेरके राजनीतिक नियुक्ति कैले बटाँ । इ कामसे ओइनके राजनीति नांगे हुइल बटिन । काल्हके दिनमे देशके विकास, उन्नत तथा समृद्घ समाज बनैना ओ गरिब जनतनके सेवा कैना खोँखर भाषण करिट् । आझ ठीक उल्टा हुइल बा, रनजनीतिक दलके नेता लोग हैचिक टाना अपन नाँट पाँटनहे ढैके ऊ गरिब निमुखा मुक्त कमैयनके छातीमे लात मारके अप्ने राज कर्टटाँ । यिहे ठकठ्युरसे मारे मोर मैगर मनरख्नी विपटमे बटी ।


जब मै इ हालत सुनके ऊ संघारी जे मोर मनरख्नीक् स्याहार सुसारमे रात दिन लागल रठाँ । हुखिँनसे अभिन आउर बात खित्कोरना मन लागल । मोर उत्सुकतासे ऊ धारावाहिक रुपमे बट्वैटी गैलाँ, लगातार होँकार ऊ कहानी सुनैटी गैलाँ, मै सुन्टी रहलँु ।


‘इ माटी, यहाँ फुल्न सक्कु फुला, सोहावनसे जामल हरेक धर्रा–धर्रैसे मित लागल रहिन ओ भाषा फेन बुझिट, हरेक मेलमे लगाइल फुलैसे ओ चारु फैलल् सु्गन्धसे साँझ बिहान बात करित ओ खेलिट् ऊ चेरियन । मुले, आब ऊ अवस्था नै हो । ऊ सब कुछ बुझइया मनै आब ओहाँ नै हुँइट । ओइनहे बहुट बहानासे ऊ कामसे निकार डेह्लाँ । ओहाँ टे आब लावा काम करुइया मनै बटाँ । जिहीहे यहाँ सक्कु माटी, सौह्रो सिंगार,हजारैं रंगके फुला,मन लोभैना सुवास ओ कञ्चन पानीसे खेल्ना यहाँक् मनोभाव बुझना अभिन लम्मा अनुभव करे पर्न जरुरी बा । उहाँ घेँचामे लगाइन चन्दरहारमे जोरल हिरा (मेरमेरिक फुला) डेखैटी फेन आपन बात आघे सलाँ । ‘हेरी इ हिरा कत्रा सोहावन रहे,लाखौं मनैन्के मन लोभवाइल हुई, मुले आझ पटपटैले पट्पटाइल बा, कत्रा निरस बा, निरास बा,हम्रे ढेर फेरा मलिकवन्हे हुँकार बर विरुवा करे परल, खाना दाना पुगाई परल, टब ठोरिक चौकस हुई, सक्हुनके मन लोभाई । मुले केक्रो ढियान नै पुगल । सक्कु जाने कामसे ज्यादा दाम ऊ फेन आनक् पसनाले भुँर भरैना मेरके । टे कैसिक चली ?’ अप्नेहे प्रतिप्रश्न कैलाँ । मै सुन्टी रहँु। ऊ फेन अपन बात आघे बर्हैलाँ ।


‘जब समिति सहेर्ले रहेटे सक्कु ढियान हुँकार सुसार मे लगैले रहे । मागल चाज डोसर दिन आपुगे । आब टे कौनो रहे । आब टे कौनो ढियाने नै हो । एक वरस पैह्लेसे टीकापुर नगरपालिका यकर जिम्मा लेहल । टब्बेसे यकर कौनो रख्वारी नै हो । अस्टे चलि कलेसे आब बरसमे इ बन्द हुई सेकठ’ उ बरा निरास हुइटी बोल्लाँ, मोर मन अभिन निराश हुइल ।


पाठक बन्द ! उ मोर मनरख्नी, जेकर वास्तविक नाउँ ‘टीकापुर पार्क’ । जौन पार्क कैलालीके टीकापुरमे दुई दशक पैह्ले बनल । काल्हिक अवस्था लाखौं पर्यटक लोगनके आकर्षणके केन्द्र बिन्दु बनल, ढेर जन्हुनके रोजी रोटी बनल, कैयौं जनहुने जिन्गी बनल मुले आझ ओकर संरक्षण सम्बद्र्घनके अभावमे जीर्ण बन्टी जाइटा । कुछ राजनीतिक दलके स्वार्थके लग ओहाँ काम कैना नुक्लीपुर ओ बंगलापुर के २१ घर परिवारके ४२ जाने मुक्त कमैया लोगनके छाक वास आँछोर गैल बा । संरक्षणके अभावमे ओहाँ लगाइल मेर मेरिक फुला रुख्वा सुखैटी जाइटा, पार्क हेरे अउइयन्के कमी लोभलग्टिक् बनाइक लग ओहाँक् जिम्मेवार टीकापुर नगर पालिका, स्थानीय जनता,राजनीतिक दल आपन आपन जिम्मेवारी साथ टीकापुर पार्क संरक्षण ओ सम्बद्र्घनमे जुटे, पार्क अभिन सुन्दर बने, अभिन लाखौं मनैनकें मन लोभवाए शुभकामना ।


–छविलाल कोपिला
मजगाँउ द्यौखर

अइ ! मोर मनरखनी  टोहाँर यी………?

–छविलाल कोपिला

मजगाँउ द्यौखर

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