भावनक जिन्गी

शंखबहादुर चौधरी
२२ आश्विन २०७८, शुक्रबार
भावनक जिन्गी

कथा



समय एक गतिशिल यात्रा हो जौन यात्रा निरन्तर रुपमे चल्टी रहठ् । समयहे न कबो रोके सेक्जाइठ्, न ते छेके । यी आपन रफ्तारमे दौरल् रहठ् । यिहे समयके रफ्तारमे मनैनहे फेन दौरे परठ् । कबो दु ःखद् यात्रामे निरन्तर चले परठ्, ते कबो सुखद यात्रामे हाँँस्ती खेल्टी रमे परठ् कलेसे केक्रो जिन्दगीम् दुःखे दुःख भरल् रहठ् । यी प्रकृतिके नियम कना हो । कि भावीके लेखन समयहे कबो तारे नै सेक्जाइठ्, उल्टे समयसंगे घुलमिल हुई जाने परठ् । समयहे चिन्ह नै सेक्बो कलेसे सदादिन रोइटी दिन बिटाइक परठ् ।
ओस्तके भावना एक सुखी परिवारमे जन्मलक चेली हुइट् हुँकार परिवारमे दाइ बाबा दादु भौजी ओ अपने मिलाके पाँच जनहनके सुखी परिवार रहिन् । जग्गा–जमिन धेर ने रलेसे फेन ओइनके परिवार बहुत सुखी रहिन् । बाबा काठक मिस्त्री करिन, दादु भौजी अनपढ हुइलक ओरसे लेवर काम करिन्, मरमंञ्जुरी कैके फेन ओइनके परिवारके गुजारा आपन किसिमके चल्टी रहिन् । एक दिनके बात हो, फुर्सदके समयमे भावनक दाइहे गाँउक मनैनसंगे मंञ्जुरी जैना मन लग्लिन् । हुँकार सोच हुइलिन मञ्जुरीसे दुइ चार पैसा कमाके लानम् ते दुई चार महिनक खर्च ते बँच्जाइ ओ दुई चार पैसा फादिल कमैले रहब ते घर गुजारा चलैना फेन कुछ सजिल हुइ कहिके मंञ्जुरी चल गैलिन् ।
घर छोर्के दुरिक यात्रा कैना क्रममे गाडी दुर्घटना हुके हुँकार दाई यी संसारसे विदा हुगैलिन विचारी ! भोज बियाह ने हुइल् भावना आपन दाइक मुवल खबर सुनके बहुत रोइली । लेकिन हुँकार चित्कार सुनुइया केउ नै साहारा कना दादु, भौजी ते रहिन् लेकिन भावननहे कुकुर हस् व्यवहार करिन ओहोंर बाबा फेन चिन्ते चिन्तामे जाँड दारुक आहार करे लग्लिन् । आपन बुर्हियक मौत पाछे चिन्ते चिन्तामे बाबा फेन यी संसार छोर्के चल्गैलिन् । बिचारी भावना एकठो खतरा चोखाइल् नै रहिन् दोसर खतरा आगैलिन आपन जन्नीक बुद्धि लागके दादु फेन भैंस पिटान पिटे लग्लिन् ।
आपन भौजिक व्यवहार ओ दादुक पिटाई सहे नै सेकके भावना फेन दोसर उपाय सोचे लग्ली । ऊ आपन आघे पाछे मौतकिल देखे लग्ली । जब मोर दाई बाबा महि छोरके यी संसारसे विदा हुगैलाँ कलेसे मै केकर लग बाचँु ? का करे बाँचुँ ? आखिर पाछे फेन ते एक न एक दिन मुएँ परी । हे ! भगनवाँ मै का विगार कैले रहुँ आझ महि यी सजाय देहटे । मोर दाई बाबाहे ते यी संसारसे लैजा सेक्ले आझ मह िपाला देहटे ।
ठिके बा मै मुनासे नै दराइठु । जब आपन रगतके मनै नै चिन्ठाँ कलेसे औरे के चिन्ही ? यी पापी संसारमे मोर आउर के बा ? आपन दुःख सहे नै सेकके एकदिन आत्माहत्या करक लाग हाठेम् लसरी लेके बन्वा ओर जाई टहिँट् । जैना क्रममे अचानक हुँकार फुइसे भेट हुगैलिन् । फुई भावननहे कुछ प्रश्न कैलिन् । तब भावना सारा आपन कहानी सुनैली । हुँकार फुई सम्झौती कलिन बाबु भावना आपन आत्माहे बल्गर बनाऊ । समाजसे लरे सेक्ना आँट करो हम्रहिन कुछ दुःख परटी किल मुएँ पर्ना कौनो जरुरी नै रहठ । हर दुःख सुखसे सामना करे सेके परठ् । तै अत्ना बैसन उमेरमे मुँके का पैबे मै लवण्डा पता लगैले बटँु बेन तै मोर बात मन्वे कलेसे भोज करल पाछे तोर सहारा तोर परिवार रहिहीँ कैके भावनाक भोज करा देलिन् ।
भोजक पाछे भावनक गोसिया फेन फुर्सद नै रठिन् । समय बित्ना कत्रा बेर ? हुँकार कोखसे बच्चा जनमलेलिन बच्चा छाई रहिन् । आपनहे जत्ना दुःख परलेसे फेन आपन छाइक सहारमे बाँचे सेक्ना आँट कैली ओ सोँचे लग्ली आब मही जत्ना दुःख परले से फेन यी बच्चा के सहारामे मै बाँचे सेकम् । एक पाँजर छाई सहारा ते पैली लेकिन फेन हुँकार दुःखक दिन शुरु हुगैलिन् । पहिले तुहु मोर जिन्दगी,तुहु मोर सहारा, तु होऊ सर्वश्व मोर कहुइया थरुवा आझ छाई–छाई लर्का पैथे कैह्के सारा रात दिन पिटे लग्लिन् । घरेसे निकारे लग्लिन बिचारी हाँठ् जोर–जोर रोइ तब्वोपर हुँकार रुवाई केऊ नै सुनिन । कत्रा दिन सहिही बिचारी ! थरुवक पिटाई सहना ते बहुत सहली लेकिन आपन मनै ने मन्लेसे केकर भरोसम् बँच्ही ? जौन आपन कोखिक साहारा रहिन् एकथो छाई लेकिन छाईहे लेके भावनाहे घर निकाला कैदेलिन् फेन हुँकार मुत्यु अपनैना दिन आगैलिन् कै दिन आनक भरोसम् बैठुँ ? कहिके आपन मुत्यु आपन घरही त्यागदेली । दैवके लेखन बिचारी पुनः सिवाय कुछ उपाय नै लग्लिन सुखिनके सहारा दुनिया रहठ् । कलेसे दुःखके सहारा भगनवाँ फेन नै रहठ् ।


शंखबहादुर चौधरी

भावनक जिन्गी

शंखबहादुर चौधरी

0 Shares
Tweet
Share
Share
Pin